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कैसे प्राप्त करें इस सावन में अश्वमेघ यज्ञ के समान फल

ऐस्ट्रो राहुल श्रीवास्तव

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श्रावण मास भगवान भोलेनाथ की स्तुति ,आराधना का विशेष एवं महत्वपूर्ण समय है। इस श्रावण मास में शिव भक्त ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है तथा शिवलोक को पाता है।
सोमवार भोलेनाथ का प्रिय दिन है।

१० जुलाई से आरम्भ हो रहे श्रावण मास का आरम्भ भी सोमवार को है और समापन भी । यह दुर्लभ संयोग १२ वर्ष बाद आया है। श्रावण में प्रतिदिन अथवा प्रति सोमवार तथा प्रदोष को शिव पूजन करना चाहिए। इस माह में लघुरूद्र ,महारूद्र पाठ करने का विधान है। घर में या शिवालय में या नदी तट पर विधि पूर्वक स्थापित या पार्थिव शिव लिंग का षोडशोपचार या पंचोपचार कर के अभिषेक करना चाहिए।
श्रावण में सोमवार को व्रत रखकर शिव पार्वती को वेल पत्र ,दूध ,दही,चावल,पुष्प तथा गंगा जल से पूजा करने से व्रती की हर कामना पूरी होती हैं।

राशि के अनुसार इस सावन कैसे करे शिव आराधना – ऐस्ट्रो राहुल श्रीवास्तव

वैसे तो श्रावण मास पर्वों का मास है। इसी संदर्भ में श्रावण के प्रत्येक मंगलवार को प्रत्येक सुहागिने मंगलागौरी का व्रत रखती है।
शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का व्रत महिलाएँ रखती है।जो की २६जुलाई को है। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी नाग पंचमी कहलाती है यह नागानामनंदकरी(नागों को आनंद देने वाली है) जो नागों को समर्पित है। इस वर्ष यह तिथि २८ जुलाई को मनाई जाएगी।
कहा जाता है की एक बार मातृश्राप से नाग लोक जलने लगा था इस दाह पीड़ा की निवृत्ति के लिए (नाग पंचमी) गो दुग्ध स्नान जहाँ नागों को शीतलता प्रदान करता है वहाँ भक्तों को सर्पभय से मुक्ति भी देता है।

श्रावण मास में प्रदोष व्रत का महत्व भी बढ़ जाता है।पहला प्रदोष २१जुलाई मृगशिरा नक्षत्र ध्रुव योग है।दूसरा प्रदोष पूर्वाआषाढा नक्षत्र विष कुंभ शनि प्रदोष व सिद्ध योग है ऐसी मान्यता है की इस काल में सभी देवगण भगवान शंकर के पूजन के निमित्त नित्य कैलाश शिखर पर प्रदोष काल में भोलेनाथ के पास चले आते है।

प्रदोष व्रती को संकल्प करने के पश्चात दिन भर निराहार रहकर सूर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व संधिवेला में “उमा महेश्वराभयाम नमः”मंत्र से आवाहन करके पंचा मृत से स्नान करके मन्दार,कमल,वेल पत्र समर्पित करके धूप दीप नैवैध् ताम्बूल निवेदित कर आरती करनी चाहिए।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को रक्षा बंधन(०७अगस्त) का पर्व मनाया जाएगा।उसने पराहनब्यापनी तिथि ली जाती है।इसमें भद्रा का निषेध करना चाहिए।भद्रा में श्रावणी एवं फाल्गुनी दोनो वर्जित है क्योंकि श्रावणी से राजा का एवं फाल्गुनी से प्रजा का अनिष्ट होता है।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा उपाकर्म का प्रसिद्ध काल माना गया है।वेद परायण के शुभाकर्म को उपाकर्म कहते है।श्रावणी पर्व मनाने का उत्तम विधान ये है की वेद आदि शास्त्रों का स्वाध्याय इस पर्व से आरम्भ होता है।

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