राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन तथ्यों की कसौटी पर खरा उतरना कठिन। तथाकथित “एप्स्टीन फाइल्स” को लेकर जिस तरह विपक्ष ने केंद्र सरकार और विशेष रूप से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी को घेरने की कोशिश की, वह अब उलटी पड़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बिना ठोस प्रमाण लगाए गए आरोप कानूनी चुनौती का रूप ले सकते हैं, और राहुल गांधी पर एक और मानहानि का मुकदमा दायर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।
एप्स्टीन फाइल्स विवाद पर हरदीप सिंह पुरी का स्पष्ट जवाब
शनिवार को हरदीप सिंह पुरी ने संयमित और तथ्यों पर आधारित प्रतिक्रिया देते हुए आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी अमेरिकी वित्तीय कारोबारी Jeffrey Epstein से मिलने की पहल नहीं की।
पुरी के अनुसार, जिन सीमित ईमेल संवादों का हवाला दिया जा रहा है, वे संस्थागत और औपचारिक प्रक्रियाओं के तहत हुए थे। उस समय एप्स्टीन के आपराधिक कृत्यों का पूरा सच सार्वजनिक नहीं था।
“मैंने किसी बैठक का अनुरोध नहीं किया था। यह संवाद आधिकारिक मंचों के माध्यम से तय हुआ था। ईमेल्स के चुनिंदा अंशों से तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता,” पुरी ने कहा।
चयनात्मक राजनीति या जवाबदेही की मांग?
अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में पुरी का नाम सीमित संदर्भों में सामने आने की बात कही जा रही है। सरकारी सूत्रों का दावा है कि पूरे मामले को राजनीतिक रंग देकर बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।
पुरी ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित समय में उनका भारतीय जनता पार्टी से कोई संबंध नहीं था। वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आर्थिक और निवेश संभावनाओं को आगे बढ़ाने में सक्रिय थे।
उन्होंने एप्स्टीन के निजी द्वीप पर जाने या उसके विमान में यात्रा करने जैसे आरोपों को खारिज किया। साथ ही, बाद में विवाद सामने आने पर उन्होंने इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट से जुड़े अपने संपर्क समाप्त करने की बात भी कही।
क्या राहुल गांधी के लिए बन सकती है कानूनी मुश्किलें?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बिना ठोस प्रमाण गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो मामला मानहानि के दायरे में आ सकता है। पहले भी राहुल गांधी को अपने बयानों को लेकर कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में यह विवाद आगे चलकर कानूनी मोड़ ले सकता है, हालांकि अभी तक किसी औपचारिक मुकदमे की पुष्टि नहीं हुई है।
संसद बनाम सुर्खियों की राजनीति
सत्तापक्ष का आरोप है कि विवाद का समय भी महत्वपूर्ण है—जब संसद में विधायी और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा जारी थी। ऐसे में सनसनीखेज आरोपों के जरिए राजनीतिक माहौल गरमाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि, विपक्ष का तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक कर्तव्य है।
पारदर्शिता और सार्वजनिक जीवन पर पुरी का जोर
हरदीप सिंह पुरी ने दोहराया कि उनका सार्वजनिक जीवन पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित रहा है।
“सत्य को शोर से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। तथ्य स्वयं बोलते हैं,” उन्होंने कहा।
एप्स्टीन फाइल्स विवाद ने भारतीय राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह मामला राजनीतिक बहस तक सीमित रहता है या कानूनी कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल, दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं।
(विवेक अवस्थी वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में indianpsu.com के मुख्य संपादक हैं। यह उनका निजी विश्लेषण है।)





